Monday, March 31, 2014



विक्रम संवत अत्यन्त प्राचीन संवत हैं। साथ ही ये गणित की दृष्टि से अत्यन्त सुगम और सर्वथा ठीक हिसाब रखकर निश्चित किये गये हैं। नवीन संवत चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि जिस नरेश को अपना संवत चलाना हो, उसे संवत चलाने के दिन से पूर्व कम-से-कम अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुका देना चाहिये। विक्रम संवत का प्रणेता सम्राट विक्रमादित्य को माना जाता है। कालिदास इस महाराजा के एक रत्न माने जाते हैं। कहना नहीं होगा कि भारत के बाहर इस नियम का कहीं पालन नहीं हुआ। भारत में भी महापुरुषों के संवत उनके अनुयायियों ने श्रद्धावश ही चलाये; लेकिन भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है और महाराज विक्रमादित्य ने देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का रहा हो, स्वयं देकर इसे चलाया है। इस संवत के महीनों के नाम विदेशी संवतों की भाँति देवता, मनुष्य या संख्यावाचक कृत्रिम नाम नहीं हैं। यही बात तिथि तथा अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी हैं वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। सारांश यह कि यह संवत अपने अंग-उपांगों के साथ पूर्णत: वैज्ञानिक सत्यपर स्थित है।

शास्त्रों व शिलालेखों में :


१.  विक्रम संवत के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में कुछ कहना मुश्किल है। यही बात शक संवत के विषय में भी है। किसी विक्रमादित्य राजा के विषय में, जो ई. पू. 57 में था, सन्देह प्रकट किए गए हैं। इस संवत का आरम्भगुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से (नवम्बर, ई. पू. 58) है और उत्तरी भारत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (अप्रैल, ई. पू. 58) से। बीता हुआ विक्रम वर्ष ईस्वी सन्+57 के बराबर है। कुछ आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष कृत के नाम से आये हैं|

२.  विक्रम संवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श का भाव उद्धृत है।

३.  विद्वानों ने सामान्यतः 'कृत संवत' को 'विक्रम संवत' का पूर्ववर्ती माना है। किन्तु 'कृत' शब्द के प्रयोग की व्याख्या सन्तोषजनक नहीं की जा सकी है। कुछ शिलालेखों में मावल-गण का संवत उल्लिखित है, जैसे - नरवर्मा का मन्दसौर शिलालेख। 'कृत' एवं 'मालव' संवत एक ही कहे गए हैं, क्योंकि दोनों पूर्वी राजस्थान एवं पश्चिमी मालवा में प्रयोग में लाये गये हैं। कृत के 282 एवं 295 वर्ष तो मिलते हैं किन्तु मालव संवत के इतने प्राचीन शिलालेख नहीं मिलते। यह भी सम्भव है कि कृत नाम पुराना है और जब मालवों ने उसे अपना लिया तो वह 'मालव-गणाम्नात' या 'मालव-गण-स्थिति' के नाम से पुकारा जाने लगा। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यदि कृत एवं मालव दोनों बाद में आने वाले विक्रम संवत की ओर ही संकेत करते हैं, तो दोनों एक साथ ही लगभग एक सौ वर्षों तक प्रयोग में आते रहे, क्योंकि हमें 480 कृत वर्ष एवं 461 मालव वर्ष प्राप्त होते हैं। यह मानना कठिन है कि कृत संवत का प्रयोग कृतयुग के आरम्भ से हुआ। यह सम्भव है कि 'कृत' का वही अर्थ है जो 'सिद्ध' का है जैसे - 'कृतान्त' का अर्थ है 'सिद्धान्त' और यह संकेत करता है कि यह कुछ लोगों की सहमति से प्रतिष्ठापित हुआ है। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योति:शास्त्रीय ग्रंथों में यह शक संवत से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए यह सामान्यतः केवल संवत नाम से प्रयोग किया गया है। 'चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ' के 'वेडरावे शिलालेख' से पता चलता है कि राजा ने शक संवत के स्थान पर 'चालुक्य विक्रम संवत' चलाया, जिसका प्रथम वर्ष था - 1076-77 ई.।

नव संवत्सर :


विक्रम संवत २०७१ का शुभारम्भ ३१ मार्च  सन् २०१४  को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा  को होगा, इस  वर्ष को  हिन्दू धर्म के लोग नये  वर्ष के रूप में मनाते है |
पुराणों के अनुसार इसी तिथि से ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव शृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करके ज्योतिषाचार्य द्वारा नूतन वर्ष का संवत्सर फल सुनते हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात: काल स्नान आदि के द्वारा शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर “ओम भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च” इस मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिए तथा नववर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्मा जी से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे भगवन! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष कल्याणकारी हो और इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाएं।' नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतुकाल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवायन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग शांत रहते हैं और पूरे वर्ष स्वास्थ्य ठीक रहता है।

राष्ट्रीय संवत:


भारतवर्ष में इस समय देशी विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की द्दष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत यदि कोई है तो वह विक्रम संवत ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से विक्रम संवत का भी आरम्भ हुआ था। प्राचीनकाल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था। राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया संवत चलाया। भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीनकाल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक नवरात्र का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्यतिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत राष्ट्र की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत राष्ट्र इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है। दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धंवंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे।

राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान:


पिछले दो हज़ार वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा इस देश को राजनीतिक द्दष्टि से पराधीन बनाने के प्रयोजन से अनेक संवतों को चलाया किंतु भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान केवल विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी रही। अंग्रेज़ी शिक्षा-दीक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण आज भले ही सर्वत्र ईस्वी संवत का बोलबाला हो और भारतीय तिथि-मासों की काल गणना से लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हों परंतु वास्तविकता यह भी है कि देश के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियाँ आज भी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनाई जाती हैं, ईस्वी संवत के अनुसार नहीं। विवाह-मुण्डन का शुभ मुहूर्त हो या श्राद्ध-तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान, ये सब भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है, ईस्वी सन् की तिथियों के अनुसार नहीं।

अन्य काल गणनाएं:


ग्रेगेरियन (अंग्रेजी) कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3582 वर्ष, रोम की2759 वर्ष यहूदी 5770 वर्ष, मिस्त्र की 28673 वर्ष, पारसी 198877 वर्ष तथा चीन की 96002307 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 112 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गयी है। जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है।


टिप्पणी : यह लेख भिन्न जगहों से ली गयी जानकारी के आधार पर लिखा गया है !

धन्यवाद !!!

- देव नेगी


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Thursday, April 18, 2013

दर्द दुखियारों का.!









मारने वालों के बारे मे तो सब पूछ रहे है,
परन्तु मरने वालों की किसी को खबर नहीं...!

राज नीति के गलियारों मे गूँज रही है आवाज बेबसीयत की,
लगे पडे है सब बटोरने में सुर्खियां अपने अपने हिस्सों की.!
परन्तु समझ नहीं पा रहे है दुख दर्द उन परिवारों का...
खोया जिन्होने टुकडे अपने जियारों का.!

क्या कसूर था उन बेकसूरों का, जो दफ्न हुए इन हाद्सों में.!
कौन जिम्मेदार है इस बजह की, क्यों हर बार ये दिन देखना पड़ता है,
जन प्रतिनिधि पल्ला झाड़ रहे है,अपनी जिम्मेदारियों से,
सब कुछ होते हुए भी, हर बार फिर क्यों वेबस  हम हो जाते है,

कुछ दिन जागते है इस सपने से फिर गहरी नींद से सो जाते है,
कैसे बदलेगी यह दयनीय स्थिति इस समाज की,
कब वह नया सबेरा आयेगा, जिस दिन चैन सकून से,
हर एक जन रह पायेगा...!!

निभा रहे है सब फर्ज अपनी दुनिया दारी का,
पर समझ न पाये कोई दर्द उन दुखयारों का...!!

© देव नेगी


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बलि एक प्रथा या कुप्रथा :



अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिये किसी की हत्या करना..! जी हाँ ये सच है अपने स्वार्थ के लिये देवी देवताओं के नाम पर आज भी कई जगह बली दी जाती है .पुराने समय से यह धारणा रही है कि बलियों के जरिये देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है। कुछ रूढ़िवादी लोगों और समूहों के द्वारा समाज में इस प्रकार की भ्रांतियां फैला दी जाती हैं। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि  एक निर्दोष  प्राणी की हत्या से कैसे ईश्वर  प्रसन्न हो सकते हैं, जबकि धरती का हर प्राणी ईश्वर  की ही देन है।  एक तरफ कहा जाता है कि हत्या करना पाप है और दूसरी तरफ अपने पापों और बुरे कर्मों के आड़ मे पाप पर पाप करते जाते है.  जब ईश्वर सबको जीवन प्रदान करता है तो हम कौन होते है किसी के जीवन को खतम करने वाले..?  कई मंदिरो मे आज भी कई बकरियों एवं बैसों की बली दी जाती है, कुछ रूढीवादी ख्यालात  वाले लोगों  की सोच के कारण निर्दोष जानवरों की हत्या की जाती है, पर क्यो..?? ये सोचने वाली बात है...!
कुछ लोगों ने इस पर अमल जरूर किया है और इसके विरुद्ध  आवाज भी उठाई और कई जगह ये सफल भी हुए, पर दु:ख  की बात यह है कि  कुछ लोगो की सोच अभी तब नये जमाने को दस्तक नहीं दे पायी.  इसी कारण कई जगह ये परम्परा के नाम पर बली प्रथा को प्रोत्साहित करते है.!!
वैसे तो बली प्रथा आज पूरे भारत में एक अभिशाप के रूप में उभरा हुआ है परन्तु कुछ राज्यों मे ज्यादा ही बली की परम्परा का प्रचलन है उनमे से एक राज्य है उत्तराखंड !! देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखण्ड में आज भी कई मंदिरो मे देवताओं के नाम पर  बली दी जाती है.
उत्तराखण्ड कें गढ़वाल एवं कुमांऊ क्षेत्रों में समान्तर रूप से बलि की प्रथा बहुत समय पहले से प्रचलित है. प्रम्पराओं एवं देवताओं के नाम पर की जाने वाली हत्या हर जगह अलग अलग रूप में होती  है. कहीं सामूहिक रूप के किया जाता है और कहीं व्यक्तिगत रूप से..!
गाँवो में दी जाने वाली बलि व्यक्तिगत रूप से परिवार के कुल देवता के लिए या भूत प्रेत आत्माओं के लिए  जाती है,.! . और सामूहिक रूप से दी जाने वाली बलि गाँव के देवता या स्थान देवता को दी जाती है. कहा जाता है अगर बलि नहीं हुई तो देवता संतुष्ट नहीं होगें. और नारज हो कर अपना प्रकोप मनुष्यों के जीवन मे डालेंगे. इससे बचने के लिए बलि दी जाती है.!
मेरी आज तक एक बात समझ में नहीं आयी जब लोग बली करते है तो सारा माँस खुद खा लेते है तो देवता क्या खाते है?? ये सोचने वाली बात है. एक बात और  सबसे पहले देवता गण माँसाहारी नहीं थे जितने भी माँसाहारी थे वो सब राक्षस गण थे तो क्या हम राक्षसों की पूजा करते है..? क्योंकि राक्षस गणो को ही मांस मदिरा चढाया जाता है.!  बात साफ है देवताओं के नाम पर खुद का शौक पूरा करना. नाम देवताओं का और राक्षस खुद बनना.. यानि कि जितने भी बलि होती है वो देवताओं के लिये नहीं बल्कि देवताओं के नाम पर खुद के लिए होती है.
उत्तराखंड में कई जगहों कर 8-9 दिन का प्रारम्परिक उत्सव मनाया जाता है इस उत्सव को भिन्न जगहों मे  अलग अलग  नामों से जाना जाता है.  गढ़वाल में कुछ हिस्सों मे इस उत्सव को अठवाडे़ (अठवार) के नाम से जाना जाता है क्योंकि ये 8 दिन का उत्सव होता है ये गढ़वाल एवं कुमांऊ दोनो क्षेत्रो मे होता है. इस उत्सव मे कई बकरे और अन्तिम दिन  नर भैसों की बली दी जाती है..!
प्रशासन द्वारा भी इसको रोकने की कई कोशिस की गई है पर प्रशासन भी अभी तक  नाकाम रहा है.
बलि प्रथा की सुर्खियों की वजह उत्तराखंड के बुनखल में हुई पशु बलि और इसे लेकर विरोध के स्वर कुछ इस कदर मुखर किए कि एक बार फिर यह कुरीति चर्चा का सबब बन बैठी । उत्तराखंड में कई ऐसे मेले और त्योहार हैं जिनमें बलि का चलन है । गढ़वाल एवं  कुमांऊ में आयोजित होने वाले अधिकांश मेले ऐसे ऐतिहासिक आख्यानों से भरे पड़े हैं । परम्परा  के मुताबिक इन आयोजनों में पशुओं की बलि देने का रिवाज है । ऐसा ही एक मेला बूंखाल मेला है । इस मेले में सैकड़ों बकरों समेत नर भैसों की जान शक्ति उपासना के नाम पर ली जाती है ।  जैसे पहले ही बता चुका हूँ कि गढ़वाल में मेलों को अठवाड़े के नाम से भी जाना जाता है ।  गढ़वाल में बलि प्रथा की बात की जाए तो अठवाड़े से ही इसका चलन शुरू होता है । हालांकि तमाम मेलों में प्रशासन द्वारा बलि प्रथा बंद करने की कोशिश की गयी है   लेकिन बूंखाल में यह क्रूर प्रथा आज भी कायम है । बीते साल सामाजिक संगठनों और प्रशासन की जद्दोजहद के बाद नब्बे नर भैसों और हजारों बकरों की बलि चढ़ाई गई थी । राज्य सरकार ने पशु बलि अवैध घोषित कर रखी है लेकिन इस मेले में इसे रोकने की अभी तक कोई सफल कोशिश दिखाई नहीं देती है । प्रशासन यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि जनजागरण के प्रयास किए जा रहे हैं । धार्मिक प्रथा पर बलपूर्वक रोक नहीं लगाई जा सकती । कुछ   संस्थाओं ने इस क्रूर प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई है । इन्हीं के चलते मेला क्षेत्र में धारा 144 लागू करनी पड़ी जबकि ठीक इसके उलट एक प्रमुख दल ने पौड़ी के जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर पशु क्रूरता कानून 1960 की धारा-28का हवाला देते हुए मेले में धारा-144 लगाए जाने को गैर कानूनी बताया । गौरतलब है कि धारा-28 के अंतर्गत धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्रतिबंधित पशुओं को छोड़ अन्य पशुओं की बलि कानूनन अपराध नहीं है ।
पर बलि क्यों..? क्या यह उचित है? क्या किसी की हत्या करना उचित है..? अगर कोइ किसी इंसान की हत्या करता है तो उसे जीवन कारवास या फाँसी की सजा का प्रावधान है किन्तु जानवरों की हत्या पर क्यों नही ? क्या वो प्राणी नही है क्या उनको जीने का हक नहीं है भगवान ने तो सबको एक समान जीवन एवं जीने का हक प्रदान किया है फिर ये भेद भाव क्यो?
उनकी हत्या इसलिये की जाती है क्योंकि वो मासूम गूंगे एवं लाचार है?? या वो प्रतिक्रिया देने मे असमर्थ है इसलिए?? पशु की हत्या करने वालो को सजा क्यों नही होती? जो एसे भेद भाव करे उसे इंसान कहते है..? क्या सच मे वो इंसान कहने लायक है? ये कैसा समाज  है जहाँ निर्दोष एवं लाचारों की बली दी जाती है और दोषियों की वह्हा वाही..! आखिर ये भेद भाव क्यों..? एसे विकृ्ति मानसिकता को क्या हम इंसानियत कह सकते है? ये बहुत बडी़ एवं गम्भीर सोचने वाली बात है..! आखिर कब तक निर्दोषों की बली होती रहेगी और हम एसे ही अपंगो की तरह हाथ पर हाथ धरे रहेगे..? सोचिये..!!
आइए सब मिल कर इस प्रथा को समाज से दूर करने का संकल्प लें.!!

धन्यवाद ..!!

© देव नेगी


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असमानता / मानवता


आज कल यह देखते हुए आश्चर्य होता है कि मनुष्य अपनी मनुष्यता भूलता जा रहा है, असमानता एवं झूठे अहंकार की चक्की मे पिसते जा रहा है ! जब दुनियाँ मे मानव आये थे तो एक समान थे पर अभी इतना भेद भाव क्यो?? जैसे कोई भी गरीब किसी बडे़ डाक्टर के पास इलाज नहीं करा सकता क्योंकि उसके फीस इतनी होती है की गरीब के २ साल का खर्चा चल जाय ! और कोई बड़ा डाक्टर किसी गरीब को देखने से कतराता है वो इस लिए कि उसको लगता है की इससे उसके इज्जत कम हो जायेगी, उसकी छोटी सोच को अघात पहुँचेगी.! साथ ही कोई बडा़ वकील किसी गरीब का केस नहीं लड़ता है, (यहाँ बडे़ का आशय पैसे से है सोच, इंसानियत या विचारों से नहीं) अगर कोई बडा़ इन्सान किसी सड़क से गुजरता है या बाजार में जाता है, और वहाँ पर कोई बच्चा या कोई भिखारी भीख माँगे तो वह इन्सान भिखारी या उस इन्सान को हीन भावना की दृ्ष्टि से देखेगा, और भीख तो दूर की बार गालियां दे कर उन्हे भगा देगा ! किसी के घर में अगर कोई सेवक जिसे लोग नौकर की उपाधि दे देते हैं, २४ घंटे मे से १५-१६ घंटे काम करता है, फिर भी उसको हीन भावना से देखा जाता है सीधे मुहं उससे बातें नहीं की जाती ! उनके प्रति कुटिल व्यवहार का प्रयोग किय जाता है, अपने को तो आलीसान मोटे- मोटे गद्दों पर सोयेंगे और उन बेचारों को एक चद्दर के साथ जमीन पर.! यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता, कहते है की भगवान के द्वार सब एक समान है, परन्तु अब तो मंदिरों में भी अब भेद भाव की कर्छी चलती है, अक्सर देखने को मिलता है अगर कोइ पैसे वाला जिसे आज कल बडा़ कहा जाता है वो मन्दिर मे दस्तक देते है तो पंडित लोग एसे सत्कार करते है कि जैसे खुद भगवान जी पधार गए हों. और एक सच्चा श्रद्धालू किसी कोने में बैठ कर ये तमाशा देख रहा होता है ! इस कल युग में पाखण्डियों का सत्कार ही होता है !
असली दु:ख तब होता है जब कई लोग अपने माँ पिता जी की भी इज्जत नहीं करते, एवं उनको असहाय छोड़ कर अपने आप अय्यासशी भरा जीवन जीते है, और बूडे़ माँ बाप किसी वृ्द्द आश्रम या अकेले अकेले कठिनाई भरा जीवन यापन करते है, आप खुद सोचिए कितनी सोचनीय एवं दु:खद बात है !
मैं भी मानता हूँ कि जीवन यापन के लिए पैसा, धन बहुत आवश्यक है, परन्तु इसके कारण दूसरों की भावना क्षीण करना कहाँ की मानवता है?
अब एक बार सोच कर देखिए जिनके बारे मे मैनें इस लेख में चर्चा की है, उनमे से उनके पैसे को अलग कर दिया जाय तो उनके पास क्या बचेगा.? क्या लोग उनकी इज्जत करेंगे..? नहीं. मतलब लोग इंसान की नहीं बल्कि उनके पैसों की इज्जत करते है ! मतलब ही इज्जत की डोर है.!

कहने का आशय यह है कि लोगों के अन्दर से इंसानियत खतम हो चुकी है मर चुकी है, अहंकार, दिखावा एवं भेद भाव की आग में सब जले जा रहे हैं और राख होने की कगार पर है !

यह देख कर आत्मीय भावना को ठेस पहुँचती है, मन दु:खी होता है, मनुष्य होने एवं मनुष्यता पर हैरानी एव लाचारी आभास होता है..!

मनुष्य का पहला धर्म मानव सेवा भाव होना चाहिए ! उसके कर्म उसका धन होता है , उसकी इज्जत उसकी पहिचान होती है !

इन भावो को हमेशा साथ रखिएगा, और अपने अन्दर खुद को जगाए रखिएगा. खुश रहें एवं खुशियाँ बाँटे..!

धन्यवाद..!!

© देव नेगी


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Friday, December 28, 2012

जिम्मेदार कौन..??


पीडि़त लड़की अब नहीं रही इस हादसे ने उसे जिन्दगी से अलग कर दिया..!
अभी हमारे देश के प्रधान मंत्री ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए कडे कदम उठाये जाएंगे..
सवाल यह उठता है कि ये कदम हादसा होने से पहले क्यों नहीं उठाए गये..?? हर बार यही क्यों होता है कि हादसे के बाद ही कार्यवाही होती है? इनकी नींद हमेशा कुछ हो जाने के बाद ही क्यों खुलती है? जितना ध्यान देश को लूटने एवं भ्रष्टाचार करने में लगाते हैं. उससे अच्छा होता कि ये ध्यान देश के विकाश में लगाते, देश की सुरक्षा मे लगाते, महिलाओ की सुरक्षा मे लगाया होता, तो देश की यह स्थिति नहीं होती, सोचने वाली बात यह है कि इसका जिम्मेदार कौन है? कहीं हम खुद तो नहीं..?
हर एक सिक्के के दोपहलू होते है, एक पहलू हमारा समाज है और दूसरा पहलू हमारे राजनीति, महत्वपूर्ण सोचने वाली बात यह है कि हमारे समाज के लोग यानि कि हम अपने बोटों के माध्यम से अपना प्रतिनिधि चुनते है, जो राजनेता कहलाता है और फिर वह अपनी राजनीती प्रारम्भ करता है, कहने का मतबल है कि कहीं न कही हम ही इस प्रक्रिया के जिम्मेदार है, क्योंकि हम एक अच्छा प्रतिनिधि चुनने में असफल हो जाते है, जिस कारण अंत मे जाकर उस गलती की सजा खुद किसी न किसी रूप मे मिल जाती है, जैसे आज पूरे देश की हालत बनी हुई है यह इसी यह गलती का परिणाम है, हम दूसरों पर अक्सर उंगलियां उठाते है परन्तु हमे ध्यान रखना चाहिए कि दूररों को कोसने से पहले अपने को देख लिया जाय.. कहीं हम खुद ठीक नही हैं तो हमारे पास कोई अधिकार नहीं होता है दूसरों को गलत साबित करने का, सुरुवात खुद से करनी होगी, तब जा कर कहीं बदलाव की किरण नजर आयेगी, पर दु:ख इस बात है कि कोई बदलाव करना नहीं चाहता, घटना के दिनों के हो-हल्ला, रैली, जुलूस सब निकालते है पर समय निकलते ही सब भूल जाते हैं. क्योकि अपनी निजी जिन्दगी जके भार से दबे दूसरे भार को उठाने मे असमर्थ हो जाते है, और समय के साथ समझौता कर लेते हैं, हालात से लडने के बजाय हालात के साथ चलने मे समझदारी समझते हैं..! जबकि ये बिल्कुल गलत है, और इसका फायदा कोई और उठा कर चला जाता है, अपने द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही खुद अपने अस्तित्व मे नहीं होता है, एक समय में एक पद पर पहुँचने के बाद वो देश, समाज एवं अपनी जिम्मेदारियां भूलते जाते है और भ्रष्ट हो जाता है, जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है, अगर बदलना है तो पहले खुद को बदलना पडे़गा फिर समाज एवं देश बदलेगा !
ऎसे कई पहलू हैं जिन पर चर्चा करना जरूरी है परन्तु आज का विषय यही है कि जो इस देश मे एक छात्रा के साथ हुआ उसका जिम्मेदार कौन है? क्या आगे भी हमारे समाज मे हो रहे महिलाओं के साथ अत्याचार दुर्व्यवहार होता रहेगा?? क्या देश यों ही इन राज नेताओं की क्रिया-प्रतिक्रिया एवं बडे़ बडे़ झूठे आस्वासनों से चलेगा..?
सोचिए ..:)



!!!*धन्यवाद*!!!

****~!~* देव *~!~****


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  © Dev Negi (देव नेगी)

Saturday, December 8, 2012

सोचा न था.!!



दास्तान-ए जिन्दगी:


आज एक बार फिर जिन्दगी ने उसी मोड़ पर खडा किया,
ऎसे कभी सोचा न था जाने किस खता का बदला लिया..!!
ये इम्तेहां है जिन्दगी की या, रूख वक्त ने बदल लिया,
सोचा न था कभी इसकदर भी तन्हा हो जायेगे हम,
 दोष दूँ किस्मत को या खता खुद से हुई है,
सोचा न था यों राहों मे चलते चलते रुक जायेगे हम,
गौरों से तो शिकवा ही क्या जब अपनों ने ही छोड दिया,
आज एक बार फिर जिन्दगी ने उसी मोड़ पर खडा किया,
ऎसे कभी सोचा न था जाने किस खता का बदला लिया.!!

इस रंग बिरंगी दुनियाँ के झरोखों में,
जाग उठी थी एक तमन्ना  जीने की,
पर सोचा न था यों  दुनियाँ को ही छोड़ जायेंगे हम,
कुछ पाने की आस में, कुछ करने की चाह में
सोचा न था इस तरह वक्त के आगोश में खो जायेंगे हम,
था अपना भी कोई सहारा जीने का,
पर शायद किस्मत बनाने वाले को यह मंजूर न था,
लोग  कहते है किस्मत का दस्तूर है ये,
हम कहते है शायद हमारा कसूर है ये,
आज एक बार फिर जिन्दगी ने उसी मोड़ पर खडा किया,
ऎसे कभी सोचा न था जाने किस खता का बदला लिया..!!

जहाँ छोड़ आये थे सारे गिलवे शिख्वे,
फिर क्यों उसी राह पर खडें है हम,
किससे करें दर्द-ए बयाँ जिन्दगी, किसे दें दोष हम,
कुछ दिल की दिल में ही रखने की तमन्ना हैं
इसी लिए आज कल खामोश है हम,
आज एक बार फिर जिन्दगी ने उसी मोड़ पर खडा किया,
ऎसे कभी सोचा न था जाने किस खता का बदला लिया..!!

© देव नेगी.



!!!!जय हिन्द!!!!


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Thursday, May 17, 2012

*जिन्दगी*




कभी कभी सोचता हूँ क्या है ये जिन्दगी,
कभी हकीकत तो कभी एक सपना  
कभी सच सी तो कभी  झूठ सी है ये जिन्दगी
कभी कभी.................
कभी रुलाये तो हँसाये ये जिन्दगी
कभी लगे तन्हा सी तो कभी लगे भरी भरी
कभी लगे अपनी तो कभी परायी सी ये जिन्दगी
कभी कभी...........
कभी दे गम तो कभी दे खुशी ये जिन्दगी
कभी दिखाये अनेक सपने तो कभी तोडे़
कभी समेटे खुशियां अपने आगंन मे तो
कभी पखं  पसारे  ये जिन्दगी
कभी कभी...........
कभी लगता एक पहेली सी है सुलजती नही
पर फ़िर भी एक सहेली सी है ये जिन्दगी
कभी लगता है मुस्कराती कभी अकेली सी
कभी धूप तो कभी छाऊँ सी ये जिन्दगी,,,
 अभी तक समझ नहीं पाया क्या है ये जिन्दगी
समझना है इसको कठिन फ़िर भी कोशिस करता हूँ.
क्या है ये जिन्दगी बस यही सोचता हूँ
कभी कभी सोचता हूँ क्या है ये जिन्दगी...!!


!!!*धन्यवाद*!!!

****~!~* देव *~!~****


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Wednesday, May 16, 2012

!!>>हम और हमारी भाषा<




अँग्रेजी भाषा के बारे में भ्रम *** गुलामी या आवश्यकता

आज के मैकाले मानसों द्वारा अँग्रेजी के पक्ष में तर्क और उसकी सच्चाई :

1. अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है:: विश्व में इस समय १० सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थायें (Top 10 Economies) अमेरिका, चीन, जापान, भारत, जर्मनी, रशिया, ब्राजील, ब्रिटेन, फ्रांस एवं इटली है| जिसमे मात्र २ देश ही अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हैं अमेरिका और ब्रिटेन वोह भी एक सी नहीं, दोनों कि अंग्रेजी में भी अंतर है | अब आप ही बताएं कि किस आधार पर अंग्रेजी को वैश्विक भाषा (Global Language) माना जाए |दुनिया में इस समय 204 देश हैं और मात्र 12 देशों में अँग्रेजी बोली, पढ़ी और समझी जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। पूरी दुनिया में जनसंख्या के हिसाब से सिर्फ 3% लोग अँग्रेजी बोलते हैं जिसमे भारत दूसरे नंबर पर है | इस हिसाब से तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा चाइनीज हो सकती है क्यूंकि ये दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है और दूसरे नंबर पर हिन्दी हो सकती है।

2. अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है:: किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है की उसमें कितने शब्द हैं और अँग्रेजी में सिर्फ 12,000 मूल शब्द हैं बाकी अँग्रेजी के सारे शब्द चोरी के हैं या तो लैटिन के, या तो फ्रेंच के, या तो ग्रीक के, या तो दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों की भाषाओं के हैं। उदाहरण: अँग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सब UNCLE चाची, ताई, मामी, बुआ सब AUNTY क्यूंकी अँग्रेजी भाषा में शब्द ही नहीं है। जबकि गुजराती में अकेले 40,000 मूल शब्द हैं। मराठी में 48000+ मूल शब्द हैं जबकि हिन्दी में 70000+ मूल शब्द हैं। कैसे माना जाए अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है ?? अँग्रेजी सबसे लाचार/ पंगु/ रद्दी भाषा है क्योंकि इस भाषा के नियम कभी एक से नहीं होते। दुनिया में सबसे अच्छी भाषा वो मानी जाती है जिसके नियम हमेशा एक जैसे हों, जैसे: संस्कृत। अँग्रेजी में आज से 200 साल पहले This की स्पेलिंग Tis होती थी। अँग्रेजी में 250 साल पहले Nice मतलब बेवकूफ होता था और आज Nice मतलब अच्छा होता है। अँग्रेजी भाषा में Pronunciation कभी एक सा नहीं होता। Today को ऑस्ट्रेलिया में Todie बोला जाता है जबकि ब्रिटेन में Today. अमेरिका और ब्रिटेन में इसी बात का झगड़ा है क्योंकि अमेरीकन अँग्रेजी में Z का ज्यादा प्रयोग करते हैं और ब्रिटिश अँग्रेजी में S का, क्यूंकी कोई नियम ही नहीं है और इसीलिए दोनों ने अपनी अपनी अलग अलग अँग्रेजी मान ली।

3. अँग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकती:: दुनिया में 2 देश इसका उदाहरण हैं की बिना अँग्रेजी के भी विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई होटी है- जापान और फ़्रांस । पूरे जापान में इंजीन्यरिंग, मेडिकल के जीतने भी कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं सबमें पढ़ाई "JAPANESE" में होती है, इसी तरह फ़्रांस में बचपन से लेकर उच्चशिक्षा तक सब फ्रेंच में पढ़ाया जाता है।
हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकी हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है। ये अँग्रेजी का ही परिणाम है की हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकी नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है। नोबल पुरस्कार के लिए P.hd, B.Tech, M.Tech की जरूरत नहीं होती है। उदाहरण: न्यूटन कक्षा 9 में फ़ेल हो गया था, आइंस्टीन कक्षा 10 के आगे पढे ही नही और E=hv बताने वाला मैक्स प्लांक कभी स्कूल गया ही नहीं। ऐसी ही शेक्सपियर, तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास आदि के पास कोई डिग्री नहीं थी, इनहोने सिर्फ अपनी मात्रभाषा में काम किया।
जब हम हमारे बच्चों को अँग्रेजी माध्यम से हटकर अपनी मात्रभाषा में पढ़ाना शुरू करेंगे तो इस अंग्रेज़ियत से हमारा रिश्ता टूटेगा। अंग्रेजी पढ़ायें इसमें कोई बुरे नहीं लेकिन हिंदी या मात्रभाषा की कीमत पर नहीं| किसी भी संस्कृति का पुट उसके साहित्य में होता है और साहित्य बिना भाषा के नहीं पढ़ा जा सकता| सोचिये यदि आज के बालकों को हिंदी का ज्ञान ही नहीं होगा तो वे कैसे रामायण, महाभारत और गीता पढ़ सकेंगे जिसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए हजारों अंग्रेज ऋषिकेश, वाराणसी, वृन्दावन में पड़े रहते हैं और बड़ी लगन से हिंदी एवं संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करतें हैं |

क्या आप जानते हैं जापान ने इतनी जल्दी इतनी तरक्की कैसे कर ली ? क्यूंकी जापान के लोगों में अपनी मात्रभाषा से जितना प्यार है उतना ही अपने देश से प्यार है। जापान के बच्चों में बचपन से कूट- कूट कर राष्ट्रीयता की भावना भरी जाती है।

* जो लोग अपनी मात्रभाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं। *

दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है की दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा 'संस्कृत' है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका चल रही है। नासा ने 'मिशन संस्कृत' शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है। कोई भी बड़े से बड़ा तीस मार खाँ अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मात्रभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मात्रभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मात्रभाषा में ही देता हैं।
किसी भी व्यक्ति कि अपनी पहचान ३ बातो से होती है, उसकी भाषा, उसका भोजन और उसका भेष (पहनावा). अगर ये तीन बात नहीं हों अपनी संस्कृति की तो सोचिये अपना परिचय भी कैसे देंगे किसी को ?
॥ मात्रभाषा पर गर्व करो.....अँग्रेजी की गुलामी छोड़ो ॥

!!! भारत माता की जय !!!

सोचिये..!!

!!!*धन्यवाद*!!!

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हमारे देश की स्थिति और घोटाले.




किसी जमाने में सोने की चिढिया कही जाने वाला हमारा देश भारत की अब स्थिति दयनीय होती जा रही है, और इससे दोषी कौन है??  किसी न किसी रूप मे खुद हम इसके जिम्मेदार है,
देखो आज कैसी स्थिति आ गयी है, कही करोंडों रूपये के घोटाले हो रहे है तो कहीं लूटपाट, कहीं काला धन विदेशो मे जमा हो रहा है, गरीबों का शोषण हो रहा है, गरीब और गरीब होते जा रहे है अमीर और अमीर होते जा रहा है, महंगाई लगातार बढती जा रही है एक आम इन्सान जा जीना मुश्किल होते जा रहा है, किसी को तो दो वक़्त की रोटी भी नसीब नही हो पा रही है, इस देश मे चाहे कुछ भी हो मारा हमेशा गरीब ही जाता है करता कोई और है भरता कोई और है, एक आम आदमी दिन रात मेहनत करके अपने खून पसीने की कमाई का कुछ हिस्सा सरकार को कर के रूप मे दान देता है राकि उस रकम से देश का विकास हो, पर ऊंचे स्तर पर बैठे ऎसा होना नही देते हैं क्योंकि उनको अपने पेट भरने से मतलब है, आम जनता की किसको पडी़..? सोचने की बात ये है कि इनके पास ये सब पैसा आता कहाँ से..? इसमे सोचने की क्या जरूरत.? ये सब हम सबका पैसा है जो हम सरकार को अपने हिस्से की रकम देते है वो देश के विकास मे नहीं बल्कि इन लोगों के परिवार के विकास हो रहा है विदेशो मे वो धन कई वर्षो से जमा है, 
पर एक बात समझ मे नहीं आयी कई प्रयासों के बावजूद भी आज तक वो धन भारत मे नहीं आया क्यो..? बाबा राम देव के द्वारा चलाये गये इस मुहिम के बाद खुद बाबा राम देव पर अंधेरे मे धोखे से हमले हुये.. आखिर क्यो..? ऎसे ही कितने क्यों के जवाब अभी बाकी है और सवाल हर उस हिन्दुस्तानी के अन्दर है जो सच्चा हिन्दुस्तानी है, पर कौन देगा इन सब क्यों का जवाब.? क्या सिर्फ हम एक सवाल तक ही सीमित रह जायेंगे? आखिर कब तक ?  कौन देगा इन सब क्यों का जवाब..? कोई नहीं क्योकि कोइ जवाब देने वाला ही नही है. बडे़ स्तर पर बैठे लोगों का देश को लूटने मे ही सार समय चला जाता है और छोटे स्तर के लोग अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी से बाहर ही नहीं निकल पाते है. दो वक़्त की रोटी के लिये एक मजदूर जितनी मेहनत करता है अगर हमारे देश के नेता उसका 1% भी काम करे तो हमारा देश दुनियां के विकसित देशो मे होता, और इस देश मे ना ही गरीबी होती और ना ही भूखमरी और ना ही इस देश की अज ये दुर्दशा होती!
ये हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज हमारे देश की हालत ये है.. और कहीं ना कही इससे जिम्मेदार हम खुद हैं. हम ही सही इंसान को पहिचानने मे गलती करते है और ऎसे देश के ळुटेरो, चोरों को गद्दी सौंप देते है, और हम सो जाते है और वो लोग अपनी मन मर्जी करते है फिर हम अपने को वैसे ही डाल देते है फिर उसी के अनुसार जीने लग जाते है, और वो अपना काम करते रहते है, फिर कभी कोई जाग उठता है और तब तक बहुत देर हो जाती है, ये भी सच है कि आज कल किसी के पास समय नहीं है मजबूरी भी है, अगर अपना काम छोड़ कर अगर इन सब लोगों के खिलाफ आवाज उठाते है तो खायेंगे क्या.? परिवार भूखा ही मर जायेगा. इसलिये जो चल रहा है चलने दो और उसी के हिसाब से हमने जीना सीख लिया है.!
हमारे कानून की तो बात ही क्या है आज का कानून सिर्फ पैसे वाले दलालों के लिए है सच्चाई एवं ईमानदारों के लिये नहीं. लगता है कि कानून भी पैसे एवं ताकत का गुलाम बन गया है, कहते है ना पैसे है तो सब है और यहाँ सब बिकता है आज कल ये सब सत्य होते जा रहा है. पैसा ही सब कुछ बन गया है ईमान धर्म कुछ नहीं बचा है इन्सान अपनी इन्सानीयत भूल चुके हैं। पैसे है तो सच कुछ है नहीं तो कुछ भी नहीं. ये सत्य भी है पर सिर्फ कुछ हद तक, परन्तु अब तो इसका मतलब ही बदल गया है., 
हमारा कानून सिर्फ नेताओं और बडें स्तर पर बैठे अधिकारियों के हाथो की कठपुतली बन कर रह गयी है, बडे बडे भ्रष्ट नेता सिर्फ दिखावे के लिये जेल जाते है फिर उनकी जमानत आराम से हो जाती है,  टेलीकोम घोटाले के महान दिग्गज नेताओं को आसानी से जमानत मिल गयी है, कितने बडी़ शर्म की बात है पूरे देश में.. अगर एक गरीब  500 (पाँच सौ रूपये) की चोरी करता है तो उसे कडी़ सजा मिलती है पर हजारों करोडों रूपये की चोरी करके ये लूटेरे आराम से आजाद हो रहे है..! ये है हमारा महान कनून, कई निर्दोष  जिन्दगी भर न्याय पाने के लिये न्ययालय के चक्कर काटते काटते थक  जाते है और देश के लूटेरे सबको खरीद कर बाहर निकल जाते हैं । अब तो लोगों का न्याय से विश्वाश ही उठता दिख रहा है, उपर से नीचे तक सब के सब बिके हुये है, सारे नेता किसी न किसी विवाद मे घिरे हुये है. कोई अश्लीलता (स्केम्) मे पकडा़ तो कोई संसद मे गंदी पोर्न फिल्म देखते हुये पकडा़ जा रहा है तो कई करोडों के घोटाले में,। यहाँ तक कि लोगों कि न्याय देने वाले न्यायाधीश भी एसे कामों मे पकडे़ जा रहे है ये बडी शर्म की बात है, ये सोचने वाली बात है कि आज हम और हमारा देश किस तरफ जा रहे हैं !  एक तरफ तो कहा जाता है कि कानून सबके लिये समान है एक है और दूसरी तरफ भ्रष्ट और चोर आसानी से छूट जाता है पर एक गरीब ईमानदार को न्याय नहीं मिल पाता, फिर ये कहावत सत्य होती है कि कानून अन्धा है. वो सच्चाई को देख नहीं सकता ! 
एक तरफ हमारे यहाँ आतंकवादी की सेवा की जा रही है वहीं दूसरी तरफ हमारी रक्षा करने वाली देश के लिये अपनी जान न्योछावर करने वाली सेना के साथ समजौता किया जा रहा है, वहाँ भी घोटाला हो रहा है ! देश के प्रमुख दुश्मन कसाव को विरयानी खिलायी जा रही है और इदर लाखो लोग बिना खाने के भूखे मर रहे है ! पर इतना सोचे कौन.? 
अगर कोई इन सब के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे भी दबाने की पूरी कोशिश की जाती है, यहाँ तक कि ये अपने बारे मे सच्चाई सुन नहीं पाते अगर कोई इनके बारे मे सच्चाई बोले तो देश का काम छोड कर सांसद मे सिर उसी मुद्दे पर चरचा होता है. और सांसद कभी तो अखाडा बन जाता है ! ये है हमारे देश के नेता..!! ऎसा देश है मेरा..!! 
अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम कैसी जिन्दगी जीने का फैसला करते हैं... !!!




सोचिये..!!


!!!*धन्यवाद*!!!

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